वृंदावन का महावन "निधिवन"


"निधिवन"

"वृन्दावन सो वन नही नन्द गांव सो गांव 

वंशीवट सो वट नही श्री कृष्ण नाम सो नाम 

सब द्वारन को छोड़ के में आया तेरे द्वार 

श्री वृषभानु की लाडली जरा मेरी ओर निहार 

राधे मेरी स्वामिनी मै राधे जी को दास

जन्म जन्म मोहे दीजियो श्री वृन्दावन को वास"


ब्रज चौरासी धाम में ऐसे बहुत प्रसिद्ध स्थल हैं, जो लोगों के बीच सदियों से आस्था का केंद्र रहे हैं। ​इनमें से बहुत से ऐसे स्थल हैं जो चमत्कारों से भरें हैं। ऐसा ही कुछ हमें देखने को मिलता है धार्मिक नगरी वृन्दावन में; निधिवन, एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। निधिवन में शिलालेख द्वारा प्राप्त जानकारी से हमें ज्ञात होता है कि यह स्थान संगीत सम्राट रसिक शेरवर स्वामी श्री हरिदास जी की यह साधना स्थली रही है। स्वामी जी और अन्य अनेक आचार्यों की समाधि यहां विद्यमान हैं। स्वामी जी ने जीवन पर्यन्त इसी वन में निवास किया था जनश्रुति है कि इस रमणीक वनस्थली में श्री कृष्ण राधा रानी ने विभिन्न क्रीड़ा की थी। यहां श्री बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल है जहां एक कुंज से उनका श्री विग्रह प्रकट हुआ था उसके समीप रंग महल में श्री श्यामा कुंज बिहारी जी की नित्य विहार लीला होती है निकट ही ललिता कुंड है। जनश्रुति है कि मुगल बादशाह अकबर ने तानसेन के साथ यहां आकर स्वामी हरिदास जी के दर्शन किए थे। ऐसी जानकारी हमें पर्यटन विभाग द्वारा लगे वहां शिलालेख पर दी गई है।


निधिवन मंदिर के साथ बहुत सी कहानियां और कुछ मिथक जुड़े हुए हैं। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि आसपास के जंगल के वृक्ष भी अजीबोगरीब और रहस्यमय हैं। वृक्षों के साथ-साथ, तुलसी के पौधे की जड़ें भी जोड़ी में लिपटे हुए बढ़ते हैं। ऐसा माना जाता है कि और रात में ये जड़ें, भगवान कृष्ण की गोपियों में बदल जाती हैं।

ललिता कुंड नामक जलाशय, इस स्थान के बीचों-बीच स्थित है। इसका नाम एक गोपीका के नाम पर रखा गया है, जिसने नृत्य के बाद भगवान कृष्ण से पानी मांगा था। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी को अपनी बांसुरी से जोता और पानी इस स्थान से निकाला था।

सुबह खुलने वाले निधिवन को शाम की आरती के बाद बंद कर दिया जाता है। इसके बाद यहां कोई नहीं रहता। दिन में निधिवन में श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है, शाम होते ही पशु पक्षी भी निधि वन को छोड़कर चले जाते हैं। निधिवन में 'रंग महल' की छत के नीचे ही श्रीकृष्ण एवं गोपियों के लिए शाम को भोग रखा जाता है, जो सुबह होने पर दिखाई नहीं देता। ऐसे में कहा जाता है कि कान्हा निशानियां भी छोड़ जाते हैं।

निधिवन के मुख्य गोसाईं जी द्वारा कहा गया यह तो शास्त्रों में भी वर्णित है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात में ही गोपियों के साथ रासलीला की थी। किंतु, निधिवन के बारे में यह मान्यताएं रही हैं कि रोज रात श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रासलीला रचाते हैं। शरद पूर्णिमा की रात, निधिवन में प्रवेश पूरी तरह वर्जित रहता है। दिन में श्रद्धालु प्रवेश कर सकते हैं, कोई रोक नहीं है। मगर, शाम होते ही निधिवन को खाली करा दिया जाता है। ऐसा सिर्फ निधिवन ही नहीं, बल्कि थोड़ी दूर स्थित सेवाकुंज में भी होता है। वहां भी कृष्ण के रास रचाने की मान्यता हैं, जहां राधा रानी का प्राचीन मंदिर है।

निधिवन दर्शन का समय:

ग्रीष्म कालीन :-  6:00-12:30    ,   4:00-7:30

शीत कालीन  :-  6:00-12:00    ,   4:00-7:00



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